Sunday, September 7, 2014



क्या करूं तू बता ज़िन्दगी
चलते चलते थकी सांस भी
क्या करूं .......

जानता हूँ गया जो लौट आना नहीं
भूलता फिर भी गुज़रा ज़माना नहीं
याद आते हैं पल संग गुज़ारे कई
ऐसा लगता है हो बात ये कल की ही
जुगनू यादों के आँगन में उड़ने लगे
सारे अरमान दिल में बिखरने लगे
अजनबी हो गए ख्वाब भी
 क्या करूं तू बता ज़िन्दगी

कल बहारों के मौसम थे बरसात थी
दिलों में उमंगों की बारात थी
महकी महकी सी लगती थी सारी फ़ज़ा
उन गेशुओं को जो छु के गुजरती हवा
अब वो दिन अब वो मौसम हैं जाने कहाँ
बस अंधेरों में लिपटा है सारा जहाँ
रूठी है चांदनी, चाँद भी 
 क्या करूं .......

क्या करूं तू बता ज़िन्दगी
चलते चलते थकी सांस भी

क्या करूं .......

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