Sunday, October 5, 2014

~~~ माँ : एक मुक्तक ~~~

असर दिखता नहीं मुझको जो दुनिया की दुआओं में
भटक जाता हूँ मैं जब भी कहीं अँधेरी राहों में
कोई भी शय ज़माने की है मुझको तब नहीं भाती
सुकूं मिलता है मुझको बस मेरी माँ की पनाहों में

~~~~ विरह : दो मुक्तक ~~~~
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तेरे बिन दिन यूँ गुजरें हैं कि जैसे कोई युग बीता
ये ऑंखें हो गयीं सावन व्याकुल मन मगर रीता
मिलन की आश में जलते ह्रदय का हाल यों है ज्यों
हो मृग कस्तूरी की खातिर, विरह में राम की सीता
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तेरी यादों के साए अब भी मेरे साथ चलते हैं
मेरी आँखों में अब भी मिलने के वो ख्वाब पलते हैं
चली आओ नज़ारे सब तुम्हारी राह तकते हैं
तुम्हारा नाम लेके लोग मुझसे अब भी जलते हैं

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 ---------- हंगामा ---------- 
बहें आंसू तो हंगामा जो मैं हंस दूं तो हंगामा
तेरी यादों पे हंगामा मेरे वादों पे हंगामा
है अपनी शख्सियत यूँ हो गयी अब तो मेरे यारों
कहीं भी जाऊं मेरे साथ ही जाता है हंगामा...

जो दिल मिल जाएँ हंगामा जो दिल टूटें तो हंगामा
किसी का इश्क हंगामा किसी का हिज्र हंगामा
ये दुनिया है इसे बस इक बहाना चाहिए यारों

यहाँ बातों पे हंगामा यहाँ हर बात हंगामा

Sunday, September 21, 2014


क़यामत तक मोहब्बत

जिस दिन तुझसे मेरा हर इक नक्श जुदा हो जायेगा
तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम लिखा रह जायेगा

जब अन्जाने में कहीं मेरी कोई निशानी पाओगे
मेरी यादों के दामन से तुम भी लिपट तो जाओगे
जब तनहा तनहा रातों में बिस्तर पे करवट बदलोगे
तब आँखों में नींद ना होगी तुम मेरे सपनों को बुलाओगे
तुम लाख चाहो फिर भी दरमियाँ इक सिलसिला रह जाएगा

तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम लिख रह जायेगा...

जब सूरज चाँद सितारे सब जाने कहाँ खो जायेगे
जब जंगल के सारे जुगनू अपने घर लौट के जायेगे
जब नदिया का सागर से मिलने का ख़त्म सफ़र हो जाएगा
जब बागों में फूलों के गए मौसम नहीं लौट के आयेगे
उस दिन भी आँखों में मिलने का ख्वाब सजा रह जायेगा

तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम लिख रह जायेगा...

जिस दिन तुझसे मेरा हर इक नक्श जुदा हो जायेगा
तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम लिखा रह जायेगा

Sunday, September 7, 2014



क्या करूं तू बता ज़िन्दगी
चलते चलते थकी सांस भी
क्या करूं .......

जानता हूँ गया जो लौट आना नहीं
भूलता फिर भी गुज़रा ज़माना नहीं
याद आते हैं पल संग गुज़ारे कई
ऐसा लगता है हो बात ये कल की ही
जुगनू यादों के आँगन में उड़ने लगे
सारे अरमान दिल में बिखरने लगे
अजनबी हो गए ख्वाब भी
 क्या करूं तू बता ज़िन्दगी

कल बहारों के मौसम थे बरसात थी
दिलों में उमंगों की बारात थी
महकी महकी सी लगती थी सारी फ़ज़ा
उन गेशुओं को जो छु के गुजरती हवा
अब वो दिन अब वो मौसम हैं जाने कहाँ
बस अंधेरों में लिपटा है सारा जहाँ
रूठी है चांदनी, चाँद भी 
 क्या करूं .......

क्या करूं तू बता ज़िन्दगी
चलते चलते थकी सांस भी

क्या करूं .......